In response to Abhi's wall post on my Quiet Diwali campaign, here is some doggerel of my own...
अमावस की रात
हम भी bomb और पटाकों से ख़ुशी मनाते थे
bomb की गूँज में रागों के सुर नज़र आते थे
gunpowder में गरम मसाले का स्वाद हम पाते थे
हवा में उड़ता वोह rocket
हमारे उड़ते हुए अरमानों का rocket था
चकरी और अनार से छूटते अंगारे को
तालियों से सम्मानित किया जाता था
फूल झरी, बिजली, parrot bomb सब हम जलाते थे
अमावस की रातें ऐसी भी थी
कान में bomb की वोह गूँज आज भी सुनाई देती है
राग अब सुनाई नहीं देते
सुर जो वोह bomb छेड़ा करते थे
अब television के static की तरह लगते हैं
अमावस की रातें ऐसी भी थी......
दो कदम चलने पुर सांस अब फूल जाती है
फेफड़े gunpowder के कारखाने की तरह
कभी भी फटने की धमकी लिए बैठे हैं
gunpowder अब गरम मसाला नहीं
गरम मसाला gunpowder लगता है
अमावस की रातें ऐसी भी थी......
अमावस की रातें ऐसी भी थी......
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